जीत या हार।

जीत या हार।  

तुम्हें हराया जब भी मैंने
खुद को भी तो हार गया
जो भी दाँव चला था मैंने
खुद मेरे मन के पार गया।।

कौन पराया अपना क्या है
बीच भँवर जब नौका ठहरी
भूल नहीं पाया उस पल को
क्षण भर जब उम्मीदें ठहरी।

ठिठक गया मैं भी उस पल को
जब दाँव सभी बेकार गया।
तुम्हें हराया जब भी मैंने
खुद को भी तो हार गया।।

भुला नहीं सकता हूँ वो क्षण
जब जीता फिर भी हारा था
अपनेपन से लड़ा बहुत मैं
तब जाकर स्वीकारा था।

जीत गया तुमसे मैं लेकिन
अपना सब कुछ हार गया।
तुम्हें हराया जब भी मैंने
खुद को भी तो हार गया।।

©️✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        03अप्रैल, 2021




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