दोष।

दोष।  

नजदीकियाँ यूँ तो बहुत थी
फिर दूरियाँ कैसे बनीं
थी चाहतें दोनों तरफ जब
फिर बात इतनी क्यूँ ठनी।।

यूँ तो सफर सीधा हमारा
औ मंजिलें भी एक थी
औ रास्तों पर रोक बहुत थे
पर भावनाएँ नेक थीं।।

जाने कब छूटा तुम्हारा
ये हाथ मेरे हाथ से
और टूटा मोह का धागा
छोटी सी किसी बात से।।

पर साथ तेरा छूटने का
सब दोष मुझ पर मढ़ गया
औ जाने कितने शब्दों से
आरोप मुझपे गढ़ गया।।

©️✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        22 अप्रैल, 2021









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