मौलिक उन्मेष।

मौलिक उन्मेष।   

दीप जले बस महलों में
तो रोशन देश नहीं होता
मुट्ठी भर की खुशियों से
मौलिक उन्मेष नहीं होता।

इक फूल खिला है गमलों में
इक फूल बिठा है सड़कों पर
इक फूल गुँथा है गजरे में
इक फूल दिखा है कचरे में।

हर फूलों की किस्मत में 
अच्छा परिवेश नहीं होता।
मुट्ठी भर की खुशियों से
मौलिक उन्मेष नहीं होता।।

शहर बसे हैं दूर गाँव से
आवाज वहाँ कब जाती है
मीलों राह चली तब जाकर
अहसासों को पाती है।

अहसासों की मंजिल का
कोई अवशेष नहीं होता।
मुट्ठी भर की खुशियों से
मौलिक उन्मेष नहीं होता।।

है दस्तूर अजब दुनिया का
उगता सूरज सब तकते हैं
समय समय का चक्कर है
इच्छाओं से कब थकते हैं।

इच्छाओं की राहों में पर
कोई अतिशेष नहीं होता।
मुट्ठी भर की खुशियों से
मौलिक उन्मेष नहीं होता।।

✍️©️अजय कुमार पाण्डेय
       हैदराबाद
       13जनवरी, 2021



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