जैसा कर्म वैसा फल।

जैसा कर्म वैसा फल।  

क्यूँ रूठते हैं लोग जो हरदम पास रहते हैं
छोड़कर दामन अलग क्यूँ जा निकलते हैं।।

जिंदगी की राह में धूप भी है छांव भी
छांव में दिखते सभी धूप में क्यूँ बिखरते हैं।।

हार-जीत का सिलसिला निर्बाध चलता है 
फिर हार पर अपनी, कोई क्यूँ बिफरता है।।

जीवन के खेल में नित नए खिलाड़ी मिलते हैं
कुछ छूट जाते बीच में, कुछ दूर तक चलते हैं।।

शब्दों के है मोल यहां, शब्द ही प्रतिमान हैं
फिर जाने लोग क्यूँ, कह कहकर मुकरते हैं।।

दौलत-शोहरत सभी, ताउम्र कब चले यहां
चाह में इनकी फिर कैसे अपने बिछड़ते हैं।।

जीवन ये मंचन है, हम सभी किरदार हैं
जैसी जिसकी भूमिका, वैसे फल मिलते हैं।।

✍️©️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        17जून,2020

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