मंज़िलों से प्यार मुझको






मंजिलों से प्यार मुझको। 

इतिहास में जो घट चुका
फिर से नहीं स्वीकार मुझको
राह जो जग चल चुका है 
चलना नहीं स्वीकार मुझको।

लक्ष्य की है चाह मुझको
उद्यम से है लगाव मुझको
विश्राम का अभी वक्त नहीं
थकना नहीं स्वीकार मुझको।

आंधी में, तूफानों  में
संभालता रहा हूँ खुदको
गलाता हूँ ताप से कंटक 
जो चुभे राह में मुझको।

कर्मयोगी बन खड़ा मैं
विश्राम नहीं स्वीकार मुझको
बीच में कैसे रुकूं मैं 
मंज़िलों से प्यार मुझको।।
***

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