नव संवत्सर

नव संवत्सर।                                                    
भोर की बेला यह पावन
सिंदूरी-सिंदूरी आंगन
अवनी से अंबर तक फैला
नूतन संवत्सर यह पावन।।

पूरब दिश से मधु किरणें आईं
मानस मन में खुशियां छाईं
सुरभित मन का कोना कोना
हर्षित प्रभात ले किरणें आईं।।

उपहारों से भरा हो प्रतिपल
देवों का आशीष हो प्रतिपल
मात-पिता के चरणों मे अर्पित
सुखद बनाएं जीवन प्रतिपल।।

शाख-शाख पर नवपुष्प खिल रहे
शीतल प्रभात उपहार बांट रहे
नदियों की कल कल धाराएं
निर्झर संग मिल गीत गा रहे।

पंछी के मंगल कलरव ने
आलस्य सारे दूर भगाया
स्फूर्ति चेतना भावों में भर
नवप्रभात लिए नव संवत्सर आया।।

अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
25मार्च 2020

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