जो मैं पढ़ता रहा

जो मैं पढ़ता रहा।              

तुम ही वो पुस्तक मेरी
जो रोज मैं पढ़ता रहा
भाव बन मुझमें तुम सजी, 
उम्र भर जिसे सजाता रहा।

कविताओं में छंद की तरह
तुम गीतों में मर्म की तरह
तुम हो वो पुस्तक मेरी, 
जिसे हरपल मैं पढ़ता रहा।।

गद्य तुम मेरे, पद्य भी मेरे
पल पल जिसे मैं लिखता रहा
भाव बन पृष्ठ पर तुम सजी
जिनमे मैं खुद से मिलता रहा।

शब्द जो मैं तेरा, अर्थ हो तुम मेरे
बन अलंकार हर पंक्ति में तुम सजे
मैं जो मुखड़ा तेरा, अंतरा तुम मेरे
उम्र भर मैं जिसे गुनगुनाता रहा।

पग-पग में बन पुष्प बन मेरे बिछी
मार्ग के कंटकों को मैं भी बिनता रहा
शर्म के रेशमी दुशाले में सिमटी रही
पाश में तेरे मैं भी तो जकड़ा रहा।

गीत बन के जीवन में ऐसे सजी
उम्र भर मैं जिसे गुनगुनाता रहा
भाव बन मुझमें तुम सजी
उम्र भर जिसे सजाता रहा।।

✍️©️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
      

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