भटकाव

            भटकाव                


दूर तलाक फैला हुआ आकाश 
आभास देता है,
असीमित है दुनिया | 
पर पृथ्वी तो गोल है 
इसका भी एक छोर है | 

क्या सचमुच आकाश असीमित है 
दूर क्षितिज नजर आता है 
लागत है अंत है दुनिया  का | 
पर वो तो भ्रम है ,
क्या हम भ्रम में जी रहे हैं ?

जीवन भी तो भ्रम है , एक जाल है 
संबंधों का , जिसमें हम उलझे हैं | 
नित नए सम्बन्ध बनते हैं, बिगड़ते हैं 
 फिर भी हम भटकते हैं ,
सुकून की तलाश में ,
सुकून नज़र आता है 
क्षितिज की तरह 
दीखता है, पर महसूस नहीं होता ,
हर वक्त कमी महसूस होती है | 

आकाश तो अंतहीन है ,
पर जीवन का अंत है ,
फिर क्यों है -
ये अंतहीन भटकाव || 


अजय कुमार पाण्डेय 


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