फूल ही नहीं काँटों में गुजरना भी सीखिए।
हर किसी को नहीं मिलता है मुकम्मल आसमां,
जिंदगी को जीना है तो मरना भी सीखिए।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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कर्तव्य-एक मौलिक महाकाव्य मंगलाचरण वाणी! आज नहीं माँगूँ मैं केवल मधुरिम गान, आज जगा दे शब्दों में फिर से सोया इंसान। ऐसी अग्नि जगा दे हिय मे...
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