अजनबी

अजनबी

दो कदम साथ जब हम चले ही नहीं,
कहें कैसे कि हम अजनबी हो गये।
साथ हम तुम कभी जब रहे ही नहीं,
कहें कैसे कि हम अजनबी हो गये।

दूर तुम भी रहे दूर हम भी रहे,
एक हसरत दिलों में दबी रह गयी।
रेल की पटरी संग चले साथ पर,
चाह दिल में मिलन की दबी रह गयी।

मिलन जब हमारा हुआ ही नहीं,
कहें कैसे कि हम अजनबी हो गये।

कर सके न वफ़ा अपने दिल से कभी,
चाहतों को सदा हम छुपाते रहे।
बात थी जो दिलों में नहीं कह सके,
हसरतों को सदा हम दबाते रहे।

हसरतें जब मिलन की दबी रह गयी,
कहें कैसे कि हम अजनबी हो गये।

एक अहसास से हम बँधे जब यहाँ,
कहें कैसे कि हम जानते ही नहीं।
इक कसक सी दिलों में दबी थी कहीं,
कहें कैसे कि पहचानते ही नहीं।

है कहीं कुछ कसक हम छुपाते रहे
कहें कैसे कि हम अजनबी हो गये।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        22 फरवरी, 2024

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