सँवर गए।

    सँवर गए।  

तेरे होठों से लगकर
गीत लिखे जो निखर गए
स्पंदित भावों से छनकर
खुशबू बनकर बिखर गए।

कोरा कागज था ये जीवन
तुमने इसमें रंग भरा
अहसासों के फूल खिलाकर
गीतों में नवरंग भरा।

तेरे अधरों के नरम छुवन से
भाव हमारे सँवर गए।
तेरे होठों से लगकर
गीत लिखे जो निखर गए।।

मेरे तन की तप्त धरा को
तेरे तन की छाँव मिली
तेरे आलिंगन में मुझको
उम्मीदों की नाव मिली।

मेरे जीवन के माँझी तुम
दूर सभी वो भँवर हुए।
तेरे होठों से लगकर
गीत लिखे जो निखर गए।।

✍️©️अजय कुमार पाण्डेय
       हैदराबाद
       30दिसंबर, 2020







कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

मेरी मृदु मुस्कान तुम्हीं से

मेरी मृदु मुस्कान तुम्हीं से  मन के नील गगन में गुंजित भावों को अमरत्व दिलाती, मेरे पथ को सज्जित करती ऐसी मृदु मुस्कान तुम्हीं से। जीवन के म...