ख्वाहिशें

ख्वाहिशें

चंद ख्वाहिशों का बोझ लिए रोज निकलता हूँ मैं।
ठोकरें खाता हूँ गिरता हूँ फिर सँभलता हूँ मैं।
इन अंधेरों का मुझको है अब नहीं खौफ कोई,
रोशनी के लिए हर रोज थोड़ा पिघलता हूँ मैं।

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