शब्द जो निकले हृदय से, क्या शून्य में खो जायेंगे

शब्द जो निकले हृदय से, क्या शून्य में खो जायेंगे

क्या मौन ही रह जायेंगी इस हृदय की कामनाएँ,
क्या शून्य में खो जायेंगी क्लांत मन की याचनायें।
जोड़ कर के भाव दिल के एक कहानी लिख रहे हैं,
शब्दों से अनुरोध करते भाव मन के दिख रहे हैं।
जो भाव अन्तस में उठे क्या व्यूह में खो जायेंगे।

शोर में रह जाये ना, दबकर हृदय की मौन भाषा,
भीड़ में खो जाये ना, घिरकर यहाँ मणिदीप आशा।
आँधियों में पल रहे हैं दीप अंतर्मन के जितने,
क्या अलंकृत हो सकेंगे मौन पलकों के वो सपने।
क्या मृदु नयन के मौन सपने अश्रु में खो जायेंगे।

सांध्य के अंतिम प्रहर का गीत हृदय को मोहता है,
आस के मधुमास में मनमीत विलय को सोचता है।
ये सोचती है रात कैसा भोर का प्रकाश होगा,
धुंध होगी रास्तों में या के खुला आकाश होगा।
जो बने अनुबंध अब तक क्या मुक्त हो खो जायेंगे।

कहीं खो गये यदि शब्द तो फिर गीत का औचित्य क्या,
कहीं तेज धूमिल हो गया तो सूर्य का लालित्य क्या।
चलो ढूँढ़ लें अपने हृदय की आज सारी रिक्तियाँ,
और पूर्ण कर लें हम चलो हर गीत की वो पंक्तियाँ।
हम आज यदि चेते नहीं कल सुप्त हो सो जायेंगे।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        14 अप्रैल, 2025

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