कविता

कविता

वक्त के हर दौर का आधार बनी है कविता।
कभी शोला तो कभी अंगार बनी है कविता।
कितने गाये हैं और कितने लिखे गीतों में,
पृष्ठों पर शब्दों का आकार बनी है कविता।

कभी रिश्ते तो कभी परिवार बनी है कविता।
रूठे रिश्तों की भी मनुहार बनी है कविता।
उम्र के हर दौर का व्यवहार जहाँ मिल जाये,
यहाँ पे हर दौर का व्यवहार बनी है कविता।

कहीं शिक्षा, तो कहीं व्यापार बनी है कविता।
वेदों की ग्रंथों का भंडार बनी है कविता।
हर भाव में जिसके सभी रूप सिमट जाते हैं,
ऐसे हर भावों का विस्तार बनी है कविता।

रूप दुल्हन का बनी श्रृंगार बनी है कविता।
प्रेम के हर रूप का उपहार बनी है कविता।
जिसके आने से मौसम में भी रंगत छाये,
वो पावन दीपों का त्यौहार बनी है कविता।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        13अक्टूबर, 2024

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लेखक परिचय

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