स्वयं से है संघर्ष अपना।

स्वयं से है संघर्ष अपना।  

चल रहा हूँ भीड़ में मैं
होड़ पर खुद से मची है
मंजिलों की दौड़ है औ
द्वंद अंतस में खिंची है।।
विजित रहूँ या अविजित मैं
परिणाम को नहीं तकना
चल पड़ा हूँ राह में मैं
स्वयं से है संघर्ष अपना।।

मैं वही हूँ जो वहाँ था
अब यहाँ हूँ कल कहाँ था
वक्त का है खेल सारा
मुक्त कोई कब यहाँ था।
बंधनों के बीच रहकर
स्वयं को है मुक्त रखना
चल पड़ा हूँ राह में मैं
स्वयं से है संघर्ष अपना।।

मिल गया इस पंथ में जो
स्वीकार उसको कर लिया
यज्ञ की आहूती बनकर
स्वयं से ही मिल लिया
मोक्ष के इस हवन में फिर
सुनूँ किसी की क्यूँ गर्जना
चल पड़ा हूँ राह में मैं
स्वयं से है संघर्ष अपना।।

©️✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        03जून, 2021





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