ओ री चिरइया

ओ री चिरइया

ओ री चिरइया, प्यारी चिरइया
तुझसे सजा अँगना रे।
तेरी ही कुह-कुह से
तेरे ही कलरव से
सोना और जगना रे।

हो कितना अँधेरा, जग में कहीं भी,
काँटे हों कितने भी, पग में कहीं भी,
तुझसे ही रस्ता दिखा।
गीत अधूरे हों, आहों के घेरे हों,
मन की गली में, कैसे अँधेरे हों,
नयनों में सपना लिखा।

सूने नयन का तू सपना सलोना,
पलकों का पलना रे।
ओ री चिरइया, प्यारी चिरइया,
तुझसे सजा अँगना रे।

अंबर से चुन-चुन के, तारे ले आऊँ,
सतरंगी चूनर में, उनको जड़ाऊँ,
बाहों के पलने में झूला झुलाऊँ।
नयनों में तेरे, काजल लगाऊँ,
तेरे आँचल में मैं, चाँद तारे सजाऊँ,
परियों की तुझको कहानी सुनाऊँ।

तुझ पर लिखूँ, गीत प्यारे सुहाने,
तुझ संग सँवरना रे।
ओ री चिरइया, प्यारी चिरइया,
तुझसे सजा अँगना रे।

©✍️ अजय कुमार पाण्डेय
         हैदराबाद
         22 जून, 2024

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

ख़याल करता हूँ

ख़याल करता हूँ वतन को बाँटने वालों से सवाल करता हूँ, मैं आज भी उसी भारत का ख़याल करता हूँ। जो सच की बात करे उसकी आवाज़ दबती है, मैं ऐसे हर सि...